
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ में राष्ट्र प्रेरणा स्थल का भव्य लोकार्पण किया। इस मौके पर पूरा शहर दुल्हन की तरह सजाया गया, सड़कों से लेकर मंच तक भव्यता दिखाई दी। लेकिन इसी चमक-दमक के बीच एक दुखद और झकझोर देने वाली खबर सामने आई है।
बचे हुए खाने ने ली सैकड़ों भेड़ों की जान
लखनऊ के बाहरी इलाके में एक भेड़ पालक की सैकड़ों भेड़ें उस वक्त मर गईं, जब उन्होंने कार्यक्रम के बाद फेंका गया बचे हुए खाने का कचरा खा लिया।
भेड़ों ने तड़प-तड़प कर अंतिम सांस ली, और कुछ ही घंटों में पूरा चरागाह मातम में बदल गया।
Ground Reality: कैमरे में कैद हुआ दर्द
वीडियो में देखिये जमीन पर पड़ी मरी भेड़ें, बेबस भेड़ पालक और सिस्टम से सवाल पूछती आवाज स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
यह कोई स्क्रिप्टेड वीडियो नहीं, बल्कि कड़वी ग्राउंड रियलिटी है।
पशुपालक की रोज़ी-रोटी पर सीधा वार
ग्रामीण इलाकों में भेड़ पालना सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि पूरे परिवार की आजीविका होता है। एक झटके में सैकड़ों भेड़ों की मौत का मतलब है— सालों की मेहनत खत्म, आर्थिक तबाही और भविष्य पर बड़ा सवाल।

मंच चमका, ज़मीन कराहती रही
विडंबना यह है कि मंच पर “प्रेरणा” की बातें हुईं। शहर को “विश्वस्तरीय” दिखाया गया। लेकिन ज़मीन पर जानवरों की जान की कोई कीमत नहीं रही। शायद विकास की तस्वीर में भेड़ें फिट नहीं बैठतीं।
सवाल जो अब भी बाकी हैं
कार्यक्रम के बाद खाने का कचरा खुले में क्यों फेंका गया? नगर निगम और प्रशासन की जवाबदेही तय होगी या नहीं? भेड़ पालक को मुआवज़ा मिलेगा या सिर्फ आश्वासन?
यह खबर सिर्फ भेड़ों की मौत की नहीं, बल्कि नीतियों और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई की है। सवाल यह नहीं कि शहर कितना सजा, सवाल यह है कि इंसान और जानवर दोनों कितने सुरक्षित हैं?
